मुलाक़ात वाला इंतेज़ार

शाम-ए-महफ़िल कहीं काफ़ूर हों गयीं
उसकी तन्हाई दिल का नासूर हों गयीं

शुमार थी हर क़िस्म की ख़ास-ए-शख़्सियत आज
दिल बीमार था , कहाँ गयी मेरी मिलकियत आज

मलिका थी वो मेरे दिल में छुपी कोई गुफा की
इंतेहाँ सा इंतेज़ार था वो , आज परीक्षा थी उसके वफ़ा की

कह के गयी थी आऊँगी चाँद निकलने से पहले
ऐ मेरे हमसफ़र पहले थोड़ी जुदाई तो सह लें

आज शायद आइना ने ही कोई बदसलूकी की होगी
उसके हुस्न को शायद उसी ने नज़र लगा दी होगी

देर बहुत हुई , मुलाक़ात का वक्त मुक़र्रर हुआ है
जल्दी आ जाओ , चाँद भी थककर सोया हुआ है

चाँदनी रात की बेला , तेरी बाट जोह रही है
तेरी बातें सोचते कहते , यादें तेरी मोह रही है

ग़र ख़फ़ा हो मेरी किसी भूल या कोई बात से
दिल से निकाल फेंको , आ जाओ मेरी कायनात में

तुझे देख के थोड़ा और जी ले , ये तमन्ना है मेरी
यें मुलाक़ात वाला इंतेज़ार , तो आदतन आदत है तेरी ।

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