एक दिन का श्रोता

Alone Man staring at world

मैं हूँ एक भोला भाला सा इंसान
रहता था सबसे अनजान
दुनियादारी का थोड़ा ना था ज्ञान
कम समझदारी से भी था हलाकान
बहुत दिनो तक घर पे बैठा सोचा करता
क्या करूँगा आगे , पेट कैसे है भरता
हमेशा दूसरों को देता श्रेय अपनी अवस्था का
नहीं करता संज्ञान अपनी सही वास्तविकता का
रोज़ दर दर की ठोकरें खाता , भूखे पेट ही कभी सो जाता
हर पल सही समय के आगमन का सोचता
जल्दी मिले हम दोनो, अपने बाल भी नोचता

एक दिन एक सु-अवसर मेरा इंतेज़ार कर रहा था
मुझे नहीं था एहसास ,कि वक़्त मेरी बाट जोह रहा था
गुज़र रहा था रास्ते पर इतर उतर 
मंज़िल ने रास्ता बदला हम हो लिए इधर उधर

लगी थी महफ़िल कहीं श्लोकों से भरी
गीता के उपदेश चल रहे थे , लगा पढ़ रहे थे स्वयं हरी
सुना उपदेश देने वाले ने कुछ बोला – श्रीमद्भागवत सम्बोधन में दो आचरण होते हैं
एक सुनना और दूसरा सुनाना ही संस्करण होते हैं
दोनो ही संस्कार मुक्तिदायिनी होतीं हैं
अर्थात् मुक्ति का मार्ग दोनो को दिखाती हैं


यूँ तो गुरु के मुख से निकलती हैं जलप्रवाहित ज्ञानगंगा
कथा और श्लोक सुनने का सामर्थ्य हो तो इंसान ने
क्या पाया महंगा

सुनो , 
पंडाल में रहते है तीन तरह के सुनने वाले
एक होता हैं सोता , जो सोया ही रहता और ज्ञान कहीं खोया रहता
दूसरा होता है सरोता, सुनने के अलावा सभी का ध्यान काटता होता (जैसे सुपारी काटी जाती है ) 
तीसरा होता हैं श्रोता , जिन्हें सिर्फ़ सुनने का लाभ होता 

कहते हैं सुनना सर्वदा बोलने से श्रेष्ठ माना गया हैं
सुना जो पाया हैं और बोला वो गँवाया हैं

उस दिन एक कथा का पाठ हों रहा था
मेरा मन पहले से ज़्यादा उद्विग्न हो रहा था 
एक कथा सुनने के बाद समझ आयी गहरी बात
कभी खुद को कम मत आंको , मत छोड़ो खुद का साथ
खुद पे भरोसा करने का हुनर सीख लो
भरोसा बहुत बड़ी पूँजी है यूँ ही नहीं बांटी जाती है
यदि खुद पर रखो तो ताकत और दूसरों पर रखो तो कमजोरी बन जाती है

सुना गुरुदेव के मुख से गीता की सीख में सुनी कही 
इंसान निराश मत हो ,कमज़ोर तेरा वक़्त है , तू नहीं

अब मिल गया हैं मुझे दर्शन
करेगा ये ही मेरा अब मार्गदर्शन
गीता की सारी सुनी आखर और बातें सच सी लग रही थी
मेरी उम्मीद उस पवित्र ग्रंथ में प्रवाहित सी हो रही थी
सच है परिस्थिति की पाठशाला ही इंसान को वास्तविक शिक्षा देती हैं
जिस तरह रण पर खड़े पांडवों को कृष्ण की वाणी गीता में अमर दीक्षा देती है

इस सोच के सहारे अब तो कमा भी लेंगे और जीवन चला ही लेंगे
ज़्यादा कुछ ना कर सके तो अपने जैसो को भी सच्ची राह दिखा ही लेंगे
मगर हार नहीं मानेंगे , हार क़तई नहीं मानेंगे
क्योंकि जहाँ विश्वास होता हैं वहाँ सबूत की क्या ज़रूरत होती है दोस्तों
आख़िर गीता पर भी कहाँ श्री कृष्ण के दस्तख़त हैं दोस्तों

उस दिन के ग़लत मोड़ ने मुझे बना दिया एक दिन का श्रोता
अगर ना सुनता वो चंद ज्ञान की बातें, जाने आगे क्या क्या होता

6 thoughts on “एक दिन का श्रोता

  1. Isska bhawarth bhut hi gahra hi…aaj aapda ke time me social media bhut hi aham bhumika nibha rhi hi……isliye ak acche shrota ke sath sath ek accha pathak (reader) BHI bnna utna hi jruri hi….kripya Puri Kavita ya aatm Chintan ko Pura pdhe… dhanywad

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