दान का मान

रामचरित में धर्म के चार आचरण माने जाते है
सत्य, दया, तप और दान सर्वदा महत्व दिए जाते है
कलि काल में एक ही धर्म प्रधान रहेगा
किसी भी तरह का दान जो आदान प्रदान करेगा
दान एक कार्य है, जिससे धरम का पालन होंवे
ऐसे लोग का अपने जीवन की समस्त समस्याओं से निदान होंवे

दान को व्यय नहीं कहा जाता , इसीलिए देने वाला महान कहलाता हैं
दान को शान समझने वाला मनुष्य ही दानवीर कहलाता हैं
ऐसे महान लोगों से भरा पड़ा है भारत वर्ष
उल्लसित हैं ये धरा जिसमें कर्ण ,बली और राम जैसे नर आए सामने सहर्ष
कर्ण ने कवच , बली ने भूमि और राम ने अपने वचन को दान में रखा
तीनों ने अपनी कथनी की लाज रखी और करनी का सम्मान रखा

हे करुणानिधान ! जिस मनुष्य के हाथ दान देते वक़्त कांपे
उस मनुष्य को दान का फल नहीं मिलता , वो खाली हाथ ही अंगीठी तापे
कहते है दान ऐसा होना चाहिए की खुदा पूछे की मेरी शान में क्या किया
बायें हाथ को पता ना चले की दहिने से क्या दान दिया

दान का मान दिखाने वाला हमेशा के लिए अमर हों जाता हैं
और लेने वाले का मन उसके लिए सदा के लिए नतमस्तक हो जाता हैं
दान धर्म किसी की जाति , वेशभूषा और उसकी सम्पन्नता देख नहीं होती
ये तो दान देने वाले और दान माँगने वाले याचक की नियत तय करती है , क्योंकि ये हैसियत देख नहीं होती

एक कहानी सुने:-

कृष्ण का था एक सखा मित्र
नाम था सुदामा और अच्छा था उसका चरित्र
हर पल सोचा करता कि दान धर्म करना हैं
जिससे दुआएँ मिले ऐसा कोई कर्म करना हैं
सुदामा तंगहाली मे रहता और था अत्यंत गरीब
घर पर खाने के लाले थे और सोया था उसका नसीब
भूख थी उसे भरमार, किंतु मन में थे प्रभु हर बार
पत्नी ,बच्चों को जीवित रखता माँग के भीख घर द्वार
एक दिन उसे चावल का दाना भूमि पर पड़ा मिला
आधा उसने पत्नी को दिया और आधा प्रभु को चढ़ाने चला
पत्नी रुष्ट हुई बोली क्या करते हो आप
प्रभु आपके महलों में रहते और खुद झेल रहे हो शाप
इस छोटे दाने से उनका मन क्या भरेगा
अगले दिन क्या खाएँगे , सोचा हैं , आगे मरना तो पड़ेगा
यह सुन सुदामा मुस्कुराया
बोला मुझमें है मेरी भक्ति और उनकी शक्ति की छाया
मेरी इतनी हैसियत कहाँ की किसी को दान दूँ या उसकी छुद्रा मिटा दूँ
इसलिए सोचा की उस विश्वात्मा को ही ये दाना अर्पण कर दूँ ,
कदाचित वो संतुष्ट हो जाए

तो सारे जीव आत्माओं की सारी भूख मिट जाए
यह सुन उनकी पत्नी ने अपना आधा दाना आगे कर दिया
अपने पति की निश्छल भक्ति देख अपना भी मन बदल दिया
दोनो ने आचमन कर चावल को भक्ति भाव से उस विश्वात्मा को चढ़ाया
दो दाने प्रभु के हाथों में आए , एक टुकड़ा उन्होंने और दूसरा भार्या को खिलाया
उस खंडित चावल का सेवन समस्त संसार की भूख़ मिटा के डकार दिला गया
ऐसी अनन्य भक्ति देख प्रभु भी उसके दान के क़ायल हो गए
इस चमत्कार को देख सारे देवता भी भाव विह्वल हो गए

अर्थात् दान ऐसा करो , कि मन किसी का भीतर तक भींच जाए
चरित्र ऐसा निर्माण करो , की प्रसिद्धी आपकी दूर तक सींच जाए

बहुत से दान के बारे में सुना
किसी से नहीं छिपा है कौन करे अनसुना :-
गोदान – भागवत में महत्व और ब्रह्मणो को सम्मान
जीवन दान – चिकित्सक का ज्ञान ,बचाये जान
ज्ञानदान- पैसों का दान , शिक्षक का उचित ज्ञान , भविष्य का निर्माण
गुप्तदान – (छिपा के) समर्थवान द्वारा इच्छा अनुसार दान
श्रमदान – पत्नी करे निस्वार्थ , पति निभाए अनेको काम
दीपदान – छोटी नदियों और पूर्वजों के आशीष के लिये अनुष्ठान
अंगदान – निशक्तजनो को गिरे से उठी अवस्था प्रदान करने वाला महानतम काम
कन्यादान – दानो का दान ,अर्थात् महादान

जिस तरह हीरा स्वयं में अधिक चमकदार होता हैं
किंतु खुद की कीर्ति में उसका कोई ना योगदान होता हैं
उसी तरह दान वह हैं , जिसमें खुद की गरिमा/कीर्ति का ध्यान ना रहे
बल्कि जो निस्वार्थ भाव से किया जाए और दूसरों को भी इसका ज्ञान ना रहे

आज के बच्चों के भीतर दान के बीज बोना आवश्यक है
हर जीव के प्रति उनका समान व्यवहार विकसित होना अतिआवश्यक हैं
जिस तरह जली हुई लड़की का भभूत शिरोमणी होता हैं
उसी तरह जरूरतमंदों के लिए कुछ भी करना नगण्य होता हैं

अंत में-
दान करने से बढ़ता है, बिन बाँटे घट जाता।
दोनों हाँथों से देते हैं, रंच मात्र ना मान दिखाना।
दानवीरता आपकी, जग में हो जाओ विख्यात।
दान धर्म जो ना किया, तो जीवन है बेकार।

ओह इंसान ! अपनी कमाई का एक टुकड़ा उस परमेश्वर की शान मे रख दो
दान कर दो , दान कर दो , दान कर दो , सहज भाव से कर दो , आज कर दो , अभी कर दो।

3 thoughts on “दान का मान

  1. It’s true donation n values is the main important things of life ….. beautiful thoughts…..

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