एक लेखनी का क्रंदन

मानस पटल की अभिव्यक्ति को जो दे ज्योति
मनुष्य की लेखनी से लिखी जाती हैं रामायण, महाभारत जैसी पोथी

समानता कोई नहीं , ऐसी हैं इसकी महानता
सागर भी छोटा पड़ जाए, लिख जो दिखाए अपनी प्रवीणता

मन के पटल पर जहाँ शब्दों का पहरा
छोड़ जाती है छाप , अगर लिखावट हो गहरा

लेखनी कथनी का आरंभ जगाती हैं
रचनाकारों और लेखकों का अदम्य साहस दिखाती हैं

इतिहास गढ़ा हैं मुझे जोत जोत के
झूठ पे सच का रंग चढ़ाया गया हैं पोत पोत के

चाहे कवि की कविता हो , जिसके बोल सर्वदा नविता हो
चाहे लेखक की कहानी हो , जिसमें मौज और रवानी हो
चाहे गीतों की माला हो,सुरों से सुशोभित कोई प्याला हो
चाहे प्रेमी का पत्र हो, जिसमें उसका प्रेम एकत्र हो
चाहे भारत का संविधान हों , जिसमें देश और उसके लोग प्रधान हों
चाहे गुनहगार की सज़ा हों , फाँसीं से धजा हो
चाहे देश का विभाजन हों , नहीं दिलों का समागम हों

चाहे वसीयत की आड़ हों , अपनो मे दुश्मनी की दाढ़ हों
चाहे किसान का हल हो, लिखे ज़मीन पे दिखाये बल वो

लिखने के अपनाए सबने अलग अलग तरीक़े
हर किसी ने क़िस्मत लिखने और बदलने के दिखाए उमदा सलीके

क्या होने वाला हैं, क्या कोई बता सकता हैं?
समय का लिखा क्या कोई मिटा सकता हैं ?
अगर मेहनत करे कोई , अपनी क़िस्मत का लिखा हर कोई बदल सकता हैं ।

आने वाले और बीते पलो के सोच और संस्कारो की साक्ष्या एवं ज्ञाता हूँ
लहु लुहान कलम की स्याही से आगे लिखी जाने वाले इतिहास की अगाध व्यथा हूँ ।

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