कविता – ज़हरीला इंसान

भगवान ने बनाया जब इंसान
उसको दे दी छोटी सी ज़ुबान

बोलने के कुछ क़ायदे थे
निभाने कुछ वायदे थे

क़ायदे से थोड़ा बोलना, यही मिली थी सीख
बड़बोलापन पड़ेगा महंगा , मिलेगी ना माफ़ी भरी भीख़

उस ज़ुबान का आकार था बहुत छोटा , मगर बहुत काम आए वो
जो सम्भाल के इस्तेमाल करे , बड़े नाम कराए जो

सुना था ब्रह्मा के उपासक वरदान माँगने उनसे करते थे विनती
उनके वचन को सत्य मान दिखाते थे अपनी अघोर शक्ति
उनके ज़ुबान का बहुतों ने देखा था पराक्रम
वो चाहे जिसे उजाड़ दे ,चाहे आशीर्वाद दे के बना दे अजेय विक्रम

एक बार धनुष से निकल बाण जो कभी ना आए हाथ
उसी तरह ज़हर भरे शब्द भी करते हैं बुरा असर , समझ जाओ हे नाथ !

ज़हर तो सापों का चोला हैं
किंतु इंसान तू कितना भोला हैं
उसका काँटा पानी ना माँगे
प्रयत्न कर तू अपनी हद ना लाँघे
जो दूसरों को तू देगा
वो ही बाद में तू भोगेगा

इसमें अब कोई नहीं हैं शंका
तेरी ज़ुबान मचा रही हैं तेरी बातों का डंका
ज़हरीला हो चुका हैं तेरा हर शब्द कोश
कर देता किसी को भी पूर्ण निशब्द , यही तेरा दोष
विष को अपने भीतर रख तू , अब बन बैठा हैं विषैला
समाज को अपनी विषैली बातों से कर बैठा हैं दुशैला

भावना विहीन मनुष्य हिंसक कहलाता हैं
विषैली बातों वाला मनुष्य विध्वंसक कहलाता हैं
काला पड़ चुका हैं तेरा मन
काले नाग की भाँति काला हैं तेरा फन
अपना विष को अपने अंदर ही रखो
दूसरों के अवगुणों को अब तुम ना देखो

सांपों की तो नियत मे ही हैं ज़हर
क्यों बरपा रहा हैं तू अपनो पे क़हर
क्यों ना सोचे तू यें अपनी इस गंदगी को द्वेष मात्र
तेरी बातें लड़ाएँ सभी को,सोचो थोड़ा अपना ये क्लेश मात्र
तेरा जनम हुआ हैं जोड़ने के लिए
साँपो की भाँति लगा हुआ हैं काटने के लिए
बुरा बोलने वाले , धराशायी हों जाएगा एक दिन
कोई नहीं चाहेगा तुझे , बाद में रह लेंगे सब तुझे बिना गिन

इसी ज़ुबान ने इंसान को हिंदू मुस्लिम कराया
इसी ज़ुबान ने दो सगे भाइयों को लड़ाया
इसी ज़ुबान ने पति पत्नी में लड़ाई भड़कायी
इसी ज़ुबान ने देश मे नफ़रत सुलगायीं 
इसी ज़ुबान ने चुनाव में झूठे वायदे करवाये
इसी ज़ुबान ने कई लोगों के तखते पलटाये

इसी ज़ुबान ने रामायण की चौपायी सुनाई
इसी ज़ुबान ने माँ की लोरियाँ सुनायी
इसी ज़ुबान ने कई बार प्यार करने वालों का फ़ायदा किया
इसी ज़ुबान ने दोस्तों के लिए जीने का वायदा किया
इसी ज़ुबान ने आशिर वचन को संभोधित किया
इसी ज़ुबान ने गीतोपदेश से अर्जुन को पोषित किया

आज का मानस ज़्यादा ज़हरीला,वातावरण हुआ पूरा ख़राब
संभल जाओ अभी कुछ नहीं बिगड़ा, बाद में देर ना हो जाए जनाब

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