कविता – किसान के बेटे

अकिंचन किसी गाँव मे एक किसान रहा करता था , उसके पास थी दस बीघा जमीं
ज़मीन बहुत उर्वरा थी , नहीं थी उसको कोई भी कमी


उसके थे दो होनहार भोले से सुंदर बेटे ,पहला परम और दूझा धरम
दोनो मिल के सेवा करते , यही था उनका सात्विक करम

एक दिन किसान ने अपने नित्य काम से निवृत्ति पाने की सोची बात
बूढ़ा शरीर , बंजर धरती देख के लग रहा था डर ,ढीले पड़ रहे थे उसके हाथ

योग्यता मे दोनो थे अतुल्य और दोनो ही उत्तीर्ण
कैसे पता लगाऊँ कौन योग्य हैं, मन बन गया उसका संकीर्ण

तभी किसान को एक युक्ति सूझा
कैसे उच्चतम ढूँढे, इस का तरीक़ा बूझा

लायक़ है बेटे , किसे उत्तम और किसे सर्वोत्तम मानूँ मै
सीख देने का वक़्त हैं , इतना ही जानूँ मैं

जीवन हैं पत्थर से भी कठोर, यही उन्हें हैं समझाना
धरती को चीर , उगानी हैं फ़सल , नही आसान ये हैं बताना

अगले दिन :-
भोर भोर में मुर्गी के शोर शोर मे
किसान ने ज़ोर ज़ोर से बेटों को अपनी ओर ओर बुलाया
बेटे भागे हुए आए और किसान ने अपना मन उन्हें बताया
दोनो बेटों को बाटी गयी जमीं बराबर
फिर बीज भी बाँट दी गयी धड़ाधड़

उस दिन दोनो ने खेत घूमा पूरा और डरते हुए ऊपर की ओर घूरा
और बोल पड़े :-
धरती पड़ी हैं सूखी और बंजर ,
किसान के लिए मरण समान यह ख़ंजर
दिन रात एक करना होगा
जाने क्या क्या सहना होगा
बैलों को हाँकना होगा
खुद को अब ढालना होगा
धूप रहेगी खूब सख़्त
भूख और प्यास लगेगी हर वक़्त
नित प्रतिदिन एक समान सा होगा
ऐसा सुख हमने पहले कभी नहीं भोगा
कृपा करके महानुभाव एक बात बताए
बारिश का आगमन कब होगा , इसका राज़ चेताएँ

यह सुन कर किसान बोला , अपना सच्चा मन खोला :-
सौ दर्द बदन पर फैलें हैं
हर करम के कपड़े मैले हैं
जो मैं उठाता हूँ अपना पहला क़दम
धरती हरी हो जाती हैं हरदम
जो मैं उठाऊँ अपना हल
लहलहा उठता हैं यह धरातल
जो मैं त्वरित गती से बिछा दूँ धरती पे इतने सारे बीज
सम्भव हो जाता खुद ही , निकल पड़ते अंकुर द्विज
मेरी मेहनत ऊपर आकाश को देख के ना होती
हर दम ऊपर वाला मेहरबान कहाँ रहता , बारिश मे कुछ देर तो होती
कभी जो ना बरसे पानी , जब बदल जाए हमारा हाल
आँखों मे सपने तब हैं बोते , सोचते अच्छा रहेगा अगला साल
गम्भीर प्रश्न हैं ये तुम्हारे , मन में क्यों लातें हों सारे
पहले टूट पड़ो इस धरती पर, इसी को करना हैं वारे न्यारे

इतना सुन के दोनो भाइयों ने यह क़सम हैं खाई
इस धरती को बंजर ना कहेंगे , अपनी हूंकार दिखायीं
लेके हल , चीर दिए थल , लगा के अपने बल
ना सोचे आज या कल , बस बढ़ते चल , बस बढ़ते चल
दिखायी दिया बेटों मे अपने संस्कारो का क्रम

अब सशर्त ये नहीं बदलेंगे , अब नहीं रहेगा मुझे भ्रम
मेरे बेटे मेरी दो आँखें , बदल कर रख देंगे मेरा जहाँ
औरों की क्या बात करूँ मैं , ऐसे बेटे मिलेंगे कहाँ ?

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