कविता – आख़िरी गलती

ऊपर वाले ने एक धरती बनाई
जिस पर उसने पहला आदम और पहली औरत भिजवाई

इंसान मनोबल मे कच्चा था
पर बातों का सीधा था और सच्चा था

एक दिन उसे दे दिया एक जंगल
जंगल मे रहता था जानवरों का दंगल

हर दम वहाँ पौधें, पेड़ लहलहाते
फूलों और फलों पर तित्ली और भँवरे मँडराते

सब कुछ अच्छा था वहाँ पर , कोई ना था करकट कूड़ा
ऊपर वाले के जंगल मे कोई नहीं होता था बूढ़ा

उनकी चलती थी बस मर्ज़ी , करते थे वे हमेशा आराम
हरदम रहमत थी उसकी , कुछ ना करना था उनको काम

तभी एक दिन आकाशवाणी हुई आकाश में
ऊपर वाला दिखा नहीं , बैठा था दूर प्रकाश में

बोला जंगल के बीच मे हैं एक पेड़ अनूठा
वो हैं एक शिक्षा का पेड़ , कभी ना तोड़ना फल और ना करना झूठा

उसकी बात इंसान के समझ मे हैं थोड़ी थोड़ी आयीं
दोनो ने उस पेड़ से सबको दूर रखा और खुद की दूरी बढ़ाई

कुछ दिन बाद एक लालची चालाक अजगर ने हैं मुँह खोला
खाके देखो फल को इंसान , ऐसा उसने बोला

जाने ऊपर वाला तुमसे क्या छिपाना चाहता हैं
ऐसा भी क्या हैं उसमें , मन मेरा घबराता हैं

देखो कितने रसीले फल हैं खाके ज़रा देख लो
फिर जान लो वो हक़ीक़त,खुदा को ही यहाँ से धकेल दो

ऐसा सुन के इंसान ने तोड़ लिया उस पेड़ से फल
जान बूझकर बना बेवक़ूफ़ , अनजान था क्या होगा कल

खुदा ने देखा हो गयी हैं इन इंसानो से एक बड़ी गलती
मना किया था जिस काम को उसकी सज़ा तो हैं तुमको मिलतीं

ऊपर वाले ने ग़ुस्से मे दे दिया उन्हें एक श्राप
बोला क्या सोचा था तुमने बच जाओगे करके यें पाप

जाओ इस जंगल से , अब इस पर नहीं हैं तुम्हारा हक़
अब सारी उमर मेहनत ही हैं करना,अब जाओगे तुम थक

अब तुम बूढ़े भी होगे , पक जाएगी यें शरीर
अब तुमको मृत्यु आएगी , मिट जाएगी जब ये लकीर

सुखी था जीवन उन इंसानो का , मूर्ख ही बन बैठा वो
ग़लतियों और दुःखों का अम्बार लाद के , आज भी आख़िर मे सब कुछ खोता वो

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